دیوان بیدل شیرازی/سلاسل
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| دولت رندان | سلاسل از بیدل شیرازی |
حسن شمایل |
| دیوان بیدل شیرازی |
| بستیم آخر زان كوی محمل | بگشاده ار چشم دریا به ساحل | |
| بر لب ز جورت جان و هنوزم | ذكر تو بر لب فكر تو در دل | |
| دیوانه را رسم گر زانكه زنجیر | زنجیر از آن زلف ما را سلاسل | |
| هر چیز جستیم جز دوست بیجا | هر ره كه رفتیم جز عشق باطل | |
| نزدیك ما یار ما دوریم از وی | با مـــا و از مـــا تا او منازل | |
| بی جذبۀ عشق نتوان نمودن | قطــــــع منــازل طی مــراحل | |
| عكس رخ دوست در وی نیفتد | چون آينـــــۀ دل نبود مقابل | |
| در كیش عشاق یكسان نماید | هم علم و عالم هم جهل و جاهل | |
| در مدرس عشق آنا ببینی | گویای خاموش خاموش قایل | |
| خندند آنجا از روی حیرت | عاقل به مجنون مجنون به عاقل | |
| بس جهد كردم تا بركنم دل | از دل نگردد مهر تو زایل | |
| نادیده رویت جان دادم آخر | بود از ازل این تقدیر بیدل |
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