دیوان شمس/آن جا که چو تو نگار باشد
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| ' | دیوان شمس (غزلیات) (آن جا که چو تو نگار باشد) از مولوی |
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| آن جا که چو تو نگار باشد | سالوس و حفاظ عار باشد | |
| سالوس و حیل کنار گیرد | چون رحمت بیکنار باشد | |
| بوسی به دغا ربودم از تو | ای دوست دغا سه بار باشد | |
| امروز وفا کن آن سوم را | امروز یکی هزار باشد | |
| من جوی و تو آب و بوسه آب | هم بر لب جویبار باشد | |
| از بوسه آب بر لب جوی | اشکوفه و سبزه زار باشد | |
| از سبزه چه کم شود که سبزه | در دیده خیره خار باشد | |
| موسی ز عصا چرا گریزد | گر بر فرعون مار باشد | |
| بر فرعونان که نیل خون گشت | بر ممن خوشگوار باشد | |
| هرگز نرمد خلیل ز آتش | گر بر نمرود نار باشد | |
| یعقوب کجا رمد ز یوسف | گر بر پسرانش بار باشد | |
| آن باد بهار جان باغست | بر شوره اگر غبار باشد | |
| زان باغ درخت برگ یابد | اشکوفه بر او سوار باشد | |
| احمد چو تو راست پس ز بوجهل | عشقا سزدت که عار باشد | |
| این را بر دست و آن بدین مات | کار دنیا قمار باشد | |
| آن کس که ز بخت خود گریزد | بگریخته شرمسار باشد | |
| هین دام منه به صید خرگوش | تا شیر تو را شکار باشد | |
| ای دل ز عبیر عشق کم گوی | خود بو برد آن که یار باشد |