دیوان بیدل شیرازی/آه شرر بار
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| خلوت یار | آه شرر بار از بیدل شیرازی |
مکان گنج |
| دیوان بیدل شیرازی |
| تن اگر خاك شدم از غم هجر تو چه باك | خاك را جان دهی ار پاي نهی بر سر خاك | |
| مردم از دوریت ای دوست به فریادم رس | ان فی هجرك موتی و حیاتی بلقاك | |
| دل اگر حسن تو خواهد ز من القلب لدیك | كه در اين آب حیاتست و در آن زهر هلاك | |
| باكم از مرگ نباشد كه لبت جان بخشاست | بیمم از زهر نباشد كه به دستم تریاك | |
| بنشاند مگرم اشك روان آتش دل | ورنه از آه شرر بار بسوزم افلاك | |
| وصف حسن تو ندانم كه برونی ز اوهام | درك ذاتت نتوانم كه فزونی ز ادراك | |
| از عدم عشق تو آورد جهانی به وجود | از جهان نام و نشان هیچ نبودی لولاك | |
| همه در حسن تو حیران و ترا می طلبند | از ثری تا به ثریا ز سمك تا بسماك | |
| همه در دام هوائیم و تو زین دام آزاد | همه آلودهٔ نفسیم و تو ز آلایش پاك | |
| گر رها كرد دلم را سر زلفش نشگفت | خود نه هر صید سزاوار بود بر فتراك | |
| تو چو خورشید منیری و فروغم ذره | تو چو دریای محیطی و وجودم خاشاك | |
| من و من بعد جدائی ز جنابت هیهات | بیدل و دوری ازین پس ز حضورت حاشاك |
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