نور محمـد بیدل شیرازی
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| من از كجــا و خيال وصــــال او حاشاك | كه هست حسن وي افزونتر ز پاية ادراك |
| مدبّري كه كنــــــد آدمي زمــام مهين | مصوّري كه گل آرد به روي مشتي خاك |
| نه روغني كه برافروخت مشعل خورشيد | نـه پايـــــه اي كه بپـــا بــــدارد افــلاك |
| نخست نور محمـد ز كن هويدا كرد | وز آن سپس ز سمــك آفريد تا به سماك |
| نبود كفـــر در شــريعت گــركننـــد | ز روي صـــدق خــلايق كـــه لا الـه لواك |
| اگر چه نيست خداوند را شريك و مدير | خدائي بر همـــه خلق آيــــــد ز ايزد پاك |
| وجود كف يد گردون و آنچه در وي هست | اگر نبـــــود ز بـــودش نگفت حق لولاك |
| اگـــــر حبيب توئي نيستم ز دشــمن بيم | وگــــر طبيب تـــوئي از مرض ندارم باك |
| مرا كه حق است خيال جمــــال تو در دل | دگر بهشـــت نخواهـــم كه النعيم لقاك |
| بگــــو كه رو به كـــه آرم كجا روم ديگر | مرا كه وصل تو باشد حيات و هجر هلاك |
| چيــــزي شـــود ار نمـــايي اجابت بیدل | كاو به صدق گويدت هر نفس جعلت فداك |
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M rastgar ۱ اوت ۲۰۱۱، ساعت ۰۷:۲۲ (UTC)